कबीर : चेतना से परम सत्य तक की छह यात्राएँ
माया माया सब कहें, माया लखे न कोय।
जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय॥
हर कोई “माया-माया” कहता है,
पर वास्तव में माया क्या है — इसे बहुत कम लोग समझते हैं।
कबीर साहेब कहते हैं:
जो चीज़ मन से उतरती ही नहीं,
जिससे मन लगातार चिपका रहता है — वही माया है।
माया केवल धन या संसार नहीं है।
माया वह है:
जिससे तुम्हारी पहचान जुड़ गई हो,
जिसे खोने का भय हो,
जिसके बिना तुम स्वयं को अधूरा मानते हो।
जब मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी,तामें दो न समाहिं॥
जब तक “मैं” था — अहंकार, पहचान, अभिमान था — तब तक ईश्वर का अनुभव नहीं हुआ।
अब “मैं” मिट गया, तो केवल वही सत्य शेष है।
प्रेम और सत्य की गली बहुत संकरी है — वहाँ “मैं” और परमात्मा दोनों साथ नहीं रह सकते।
“प्रेम का अर्थ है — स्वयं से मुक्त होना।”
जब तक व्यक्ति अपने छोटे-से “मैं” में कैद है,
तब तक वह:
न प्रेम कर सकता है,
न सत्य जान सकता है,
न स्वतंत्र हो सकता है।
ईश्वर को पाने की शर्त — स्वयं को खो देना।
प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय।
जा मारग साहिब मिले, प्रेम कहावै सोय॥
कबीर साहेब कहते हैं कि संसार में हर व्यक्ति प्रेम की बात करता है, परंतु बहुत कम लोग प्रेम के सत्य को जानते हैं। अधिकतर लोग आकर्षण, आवश्यकता, अकेलेपन या स्वार्थ को ही प्रेम समझ लेते हैं। इसलिए कबीर कहते हैं — “प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न जाने कोय।” अर्थात प्रेम बोलने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की अवस्था है।
कबीर के अनुसार सच्चा प्रेम वह नहीं जो केवल भावनाओं तक सीमित हो। यदि प्रेम में भय, अधिकार, अपेक्षा और पकड़ है, तो वह प्रेम नहीं, आसक्ति है। प्रेम का अर्थ है — स्वयं को छोटा कर देना, अहंकार को पिघला देना, और दूसरे के सुख-दुःख में स्वयं को देख पाना। प्रेम वहाँ प्रारंभ होता है जहाँ “मैं” का कठोरपन टूटने लगता है।
कबीर प्रेम को परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं। जो मार्ग मनुष्य को सत्य, शांति, करुणा और आत्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाए, वही प्रेम का मार्ग है। यदि कोई संबंध या भक्ति हमें अधिक लोभी, भयभीत या अस्थिर बना रही है, तो वह प्रेम नहीं हो सकता। सच्चा प्रेम मनुष्य को भीतर से निर्मल और सत्यनिष्ठ बनाता है।
मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में। ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में। ना तो कौन क्रिया-कर्म में, नहीं योग बैराग में। खोजी होय तो तुरतै मिलिहौं, पल भर की तलास में। कहैं कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में॥
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ईश्वर को बाहर-बाहर खोजता फिरता है—मंदिरों, मस्जिदों, तीर्थों, कर्मकाण्डों और योग-वैराग्य में।
लेकिन सत्य, परमात्मा या चेतना कहीं दूर नहीं है; वह तो स्वयं मनुष्य के भीतर, उसकी हर साँस में उपस्थित है।
जो सच्चा खोजी बनता है, उसे यह सत्य तुरंत अनुभव हो सकता है।
तू भगवान को बाहर क्यों ढूँढ़ रहा है?
वह न केवल मंदिर में है, न मस्जिद में, न किसी विशेष पूजा-पद्धति में।
अगर मन शांत और जागरूक हो जाए, तो वही सत्य अपने भीतर महसूस होने लगता है।
असली समस्या यह नहीं कि भगवान कहाँ है; समस्या यह है कि मन बाहर भाग रहा है।
जब तक व्यक्ति पहचान, परंपरा, कर्मकाण्ड और अहंकार में उलझा है, तब तक सत्य छिपा रहेगा।
“सब स्वाँसों की स्वाँस में” का अर्थ है—जो चेतना अभी तुम्हें जीवित रखे हुए है, उसी को पहचानना अध्यात्म है; सत्य कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं की जागी हुई अवस्था है।
कंकर पाथर जोड़ि के, मसजिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥
पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।
ताते यह चाकी भली, पीस खाय संसार॥
कबीर साहेब बाहरी धार्मिक प्रदर्शन पर प्रश्न उठाते हैं।
क्या ईश्वर को ऊँची आवाज़ से पुकारने की आवश्यकता है?
यदि पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो पहाड़ सबसे बड़े भगवान होते।
साहेब उपयोगिता और जीवित सत्य को महत्व देते हैं।
चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥
जीवन समय और संसार की दो चक्कियों के बीच पिस रहा है।
अहंकार और मोह में फँसा व्यक्ति बच नहीं पाता।
यहाँ चक्की का निचला पाट स्थिर रहता है और ऊपर वाला पाट घूमता है, ठीक वैसे ही इस संसार में प्रकृति और समय स्थिर रहते हैं जबकि मनुष्य लगातार इच्छाओं, चिंताओं और वासनाओं की चक्की में पिसता रहता है। अहंकार और अज्ञान के साथ जीने वाला कोई भी व्यक्ति इस भवसागर के संघर्ष से अछूता नहीं रह पाता। संसार के दो पाट – अर्थात जीव और जगत का संबंध का द्वंद -अहंकार (अहम) का संसार की तरफ झुकाव ही मनुष्य के सभी दुखों का मूल कारण है
रोना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य जीवन कितना दुर्लभ है, फिर भी लोग इसे अज्ञानता में गंवा देते हैं। इस पिसनहार से बचने का केवल एक ही उपाय है—जागरूकता और आत्म-ज्ञान। जो व्यक्ति बोध के साथ जीता है और चक्की के केंद्र (कील) की तरह स्थिर रहना सीख जाता है, वह इस संसार रूपी चक्की की मार से मुक्त हो जाता है अन्यथा अहंकार का सर्वनाश तय है।



