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एक राम घट-घट में बैठा !
एक राम का सकल पसारा !

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एक राम है सबसे न्यारा !

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कबीर : चेतना से परम सत्य तक की छह यात्राएँ

माया माया सब कहें, माया लखे न कोय।
जो मन से न उतरे, माया कहिए सोय॥

हर कोई “माया-माया” कहता है,
पर वास्तव में माया क्या है — इसे बहुत कम लोग समझते हैं।

कबीर साहेब कहते हैं:
जो चीज़ मन से उतरती ही नहीं,
जिससे मन लगातार चिपका रहता है — वही माया है।

माया केवल धन या संसार नहीं है।
माया वह है:

जिससे तुम्हारी पहचान जुड़ गई हो, 
जिसे खोने का भय हो,
जिसके बिना तुम स्वयं को अधूरा मानते हो।

चलती चाकी देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥

जीवन समय और संसार की दो चक्कियों के बीच पिस रहा है।
अहंकार और मोह में फँसा व्यक्ति बच नहीं पाता।

यहाँ चक्की का निचला पाट स्थिर रहता है और ऊपर वाला पाट घूमता है, ठीक वैसे ही इस संसार में प्रकृति और समय स्थिर रहते हैं जबकि मनुष्य लगातार इच्छाओं, चिंताओं और वासनाओं की चक्की में पिसता रहता है। अहंकार और अज्ञान के साथ जीने वाला कोई भी व्यक्ति इस भवसागर के संघर्ष से अछूता नहीं रह पाता। संसार के दो पाट – अर्थात जीव और जगत का संबंध का द्वंद -अहंकार (अहम) का संसार की तरफ झुकाव ही मनुष्य के सभी दुखों का मूल कारण है

रोना इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य जीवन कितना दुर्लभ है, फिर भी लोग इसे अज्ञानता में गंवा देते हैं। इस पिसनहार से बचने का केवल एक ही उपाय है—जागरूकता और आत्म-ज्ञान। जो व्यक्ति बोध के साथ जीता है और चक्की के केंद्र (कील) की तरह स्थिर रहना सीख जाता है, वह इस संसार रूपी चक्की की मार से मुक्त हो जाता है अन्यथा अहंकार का सर्वनाश तय है।